शनिवार, 24 नवंबर 2018


असहमति की ज़गह बरकरार रहनी चाहिए 

एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के प्रायोजन   में  संगीत के कार्यक्रम आयोजित करने वाली संस्था स्पिक- मैके ने दिल्ली में 17 नवंबर 2018 को कर्नाटक संगीत के संगीतज्ञ  टी एम कृष्णा के संगीत कार्यक्रम का आयोजन रखा था लेकिन अंतिम घड़ी में एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया  अपने प्रायोजन से मुकर गई जिसकी वजह से स्पिक-मैके को यह कार्यक्रम रद्द करना पड़ा |   टी एम कृष्णा के संगीत कार्यक्रम को अचानक रद्द करने का कारण बताया गया था ट्वीटर -हैण्डलरों  के ट्वीट को जो लगातार कृष्णा के  खिलाफ आग उगल रहे थे| कंसर्ट के रद्द होने के कारणों में सबसे अहम भूमिका रही हिंदुत्व ट्रोलरों की जिन्होनें कृष्णा के ख़िलाफ़ तरह-तरह के दोषारोपण किये जिनमें से एक शहरी नक्सल कहना भी है | इन ट्वीटरों की धमकी भरी भाषा से एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के अधिकारी अनुमानतः या तो डर गए या डरा दिए गए| नमूने के तौर पर एक ट्वीट देखा जा सकता है जिसमें  कृष्णा की छवि को धूमिल करने की कोशिश की गयी है | ट्वीट  दिलचस्प है, और भयानक भी  ,"क्या आप जानते हैं वह (कृष्णा) प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी जी से जबरदस्त घृणा करता है, हिन्दुओं, भारतीय जनता पार्टी और राष्ट्रीय  स्वयं संघ  से असहमति जताता है| करदाताताओं का पैसा और एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के कर्मचारियों का समय उसके ऊपर क्यों बर्बाद होने दिया जाए | " इसी तरह के ट्वीट्स ट्रोल हैंडलरों ने चलाया और  एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के अधिकारी संभवतः  दबाव में आ गए | कृष्णा ने तब सार्वजनिक रूप से अपील की, "मुझे 17  नवंबर, 2018  (जिस दिन स्पिक-मैके ने कार्यक्रम रखा था ) को दिल्ली में  कहीं भी मंच दीजिये मैं आऊंगा और गाऊंगा | हम इस तरह की धमकियों से डर नहीं सकते हैं | "  रामचंद्र गुहा ने भाजपाइयों के इस दुष्कृत्य  की निंदा इन शब्दों में की,"एक बड़े संगीतकार को राष्ट्रीय राजधानी में अपनी कला के प्रदर्शन से रोकना और उसे  बाधित करना असहिष्णुता ही नहीं बल्कि बर्बरता है |"  ट्रोल हैंडलरों को जब पता चला की कृष्णा दिल्ली में गाने वाले हैं तो उन्होंने कृष्णा को गाली देना शुरू किया और मांग करना शुरू किया की कृष्णा के कॉन्सर्ट को रद्द किया जाए | ट्रोल-हैंडलर्स कृष्णा के संगीत के बारे में शायद ही कुछ जानते होंगे, उन्हें सिर्फ यह मालूम है कि कृष्णा हिंदुत्व और मोदी सरकार के आलोचक हैं | कृष्णा के पक्ष में आख़िर में दिल्ली की आप सरकार खड़ी  हुई |आप सरकार ने इस घटना को लोगों के सरकार के ख़िलाफ़ बोलने की आज़ादी पर कुठाराघात बताया और इसकी तुलना फांसीवाद से किया |  इसमें कोई संदेह नहीं है कि मोदी सरकार जब से आयी है अभिव्यक्ति और बोलने की आज़ादी पर संकट लगातार मडराता रहा है | लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार भारतीय संविधान देता है लेकिन मोदी सरकार इस अधिकार को सिमित करने की लगातार कोशिश कर रही है | बिना सरकार के परोक्ष या अपरोक्ष समर्थन के ट्रोल -हैंडलर्स सरकार के खिलाफ बोलने वाले आलोचकों पर आकर्मण कर नहीं सकते | भय का माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है | 

ख़ौफ़ पैदा करने वालों को याद रहे कि पक्की और चमकदार सड़कें, फ्लाईओवरों , मेट्रो, स्टेडियमों, हवाई अड्डों, प्रतिमाओं इत्यादि    जैसे निर्माण अगर विकास के विश्वसनीय मानदंड होते तो दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शिला दीक्षित दिल्ली के विधानसभा  चुनाव  में कभी भी नहीं हारतीं और न कांग्रेस पार्टी को पराजय का सामना करना पड़ा होता| शाइनिंग इंडिया भी विकास का मानदंड नहीं हो सकता है, यदि ऐसा होता तो अटल विहारी वाजपेयी जैसे व्यक्ति जो कमोबेस सबको स्वीकार्य थे, की सरकार कांग्रेस के हाथों 2004 में कभी नहीं पराजित होती | देश में फांसीवादी स्तिथियां पैदा करने से हिंदुस्तान में सत्ता में बने रहना किसी के लिए भी असंभव है | आम लोगों को क्या चाहिए, परिवार पालने के लिए एक ओट, पेट भरने के लिए दो जून का भोजन, ओट और भोजन जुटाने के लिए आठ घंटे का काम, बच्चों के लिए स्कूल और कॉलेज, बीमारी  का इलाज और इन सब के ऊपर बोलने की आज़ादी जो उनको  भारत का संविधान सुनिश्चित रूप से देता है| अगर कोई घर मांगे, नौकरी मांगे, जीने का अधिकार मांगे, बोलने का अधिकार मांगे और यह सब नहीं मिले तो विरोध प्रदर्शन करे, सरकार की आलोचना करे , सरकार और व्यवस्था से मत-भिन्नता प्रकट करे     और आप उसके पीछे ट्रोल हैंडलरों को लगा दें, तो कैसी स्तिथि बनेगी | और आप किस-किस के पीछे इन ट्रोल-हैंडलर्स को सक्रिय करेंगे | यह देश आज विरोध प्रदर्शनों से भरा पड़ा है | किसानों के ख़िलाफ़ ये ट्रोल हैंडलर्स सक्रीय होगें जो सोशल मीडिया जानते ही नहीं हैं और अगर जानते भी होगें तो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता |  आम लोगों के बोलने  की आज़ादी का उदाहरण देखना है तो आप उत्तर भारत के गावों, कस्बों और छोटे शहरों की पान और चाय की दुकानों पर देख सकते हैं | भले ही खाना नहीं खाया हो, चाय की चुस्की लेते हुए लोग सारे संसार की राजनीति - मोदी से ट्रम्प तक- बतिया जाते हैं | घर और भोजन से भी अधिक ज़रूरी है बोलने की आज़ादी | इंसान जैसी भी स्तिथि में हो वह बोलना चाहता है और जब बोलने की आज़ादी पर कोई आघात करता है तो वह बर्दाश्त नहीं कर पाता है | बोलने की आज़ादी पर आघात का परिणाम था 1977 में दुर्गा की उपाधि से विभूषित इंदिरा गाँधी की करारी हार | कहते हैं नोटबंदी के दौरान लोगों का बड़े पैमाने पर रोज़गार छीन गया |   वादे जो 1914 के चुनाव के दौरान भारतीय जनता पार्टी ने किए थे मोदी सरकार ने आजतक पूरे  नहीं किए और अमित शाह ने उन वादों को चुनावी जुमला कह कर टाल  दिया| झूठ , जुमलों  और तमाम परेशानियों का विरोध तो होना ही है |  लेकिन एक बात तो तय है कि भारत की जनता अपने नागरिक अधिकारों पर किसी भी तरह के आघात को सहन नहीं कर सकती है, बोलने की आज़ादी पर विशेषकर | बोलने की आज़ादी आलोचना की आज़ादी है और जिसके अनेक प्रारूप हैं, कला, संगीत, नृत्य, लोक कला, साहित्य, संस्कृति इत्यादि | बोलने के  किसी भी आज़ादी के प्रारूप  पर आघात, परोक्ष या अपरोक्ष नियंत्रण या पाबंदी लोगों की सहन शक्ति का परिक्षण है | दिल्ली में कर्नाटक संगीत के संगीतकार टी एम कृष्णा का  कंसर्ट स्पिक मकै फाउंडेशन ने एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के प्रयोजन में आयोजित किया था | ऐन वक़्त यह कंसर्ट प्रायोजित करने से  एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया ने मना  कर दिया, नतीजतन      स्पिक मकै फाउंडेशन को यह कंसर्ट रद्द करना पड़ा | इस पर राजनितिक घमासान शुरू हुआ | कहा गया कि कंसर्ट रद्द करवाने के पीछे मोदी सरकार के हाथ हैं क्योंकि टी एम कृष्णा के विचार मार्क्सवादी हैं और उनका संगीत उसी विचारधरा की पोषक है | यह कहना निरर्थक नहीं होगा कि जो कला जनता का विशुद्ध मनोरंजन करे, उसका बौद्धिक विकास करे और उसकी चेतना को जागृत करे और उसमें परिवर्तन की आकांक्षा जगा दे वही सामाजिक और जन -कला है | उसी कला में आम आदमी अपनी आकांक्षाओं को पूरा होते हुए देखता है उसीमें उसके सपने साकार होते हैं उसी में अपनी लड़ाई लड़े जाते हुए देखता है, वही कला उसकी बोलने की आजादी की रक्षा करता है, उसे संबल देती है | ऐसी कला राजनीति से दूर नहीं हो सकती है, विचारों से दूर नहीं हो सकती है, ऐसा कलाकार विचारों से दूर नहीं हो सकता है | टी एम् कृष्णा अपनी संगीत कला के माध्यम से अपने एक्टिविज्म को छुपाते नहीं हैं |वे कहते हैं कि जैसे ही आप प्रश्न पूछने लगते हैं और प्रश्न पूछना जारी रखते हैं आपको संदेह से देखा जाने लगता है | वे कहते हैं कि कला का राजनीतिकरण होना चाहिए | ऐसा कह के कृष्णा बोलने की आज़ादी की ही पैरवी करते हैं |    एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के कंसर्ट के रद्द होने की वजह सोशल मीडिया पर कृष्णा के ख़िलाफ़ दुष्प्रचार बताया गया है | कृष्णा की आज़ादी पर आघात पहुंचाया मोदी सरकार और भारतीय  जनता पार्टी  के ट्रोल-हैंडलरों ने दुष्प्रचार से , जो एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया  पर प्रयोजन वापस लेने के लिए दबाव बनाने में सफल रहे| कृष्णा की आज़ादी पर हुए हमले को दिल्ली की प्रबुद्ध जनता ने नापसंद किया और उनकी इस भावना को दिल्ली की आप पार्टी की सरकार ने कृष्णा के कंसर्ट को सरकारी आयोजन बना के सम्मान किया | यहाँ दर्ज़ करना समीचीन होगा कि  दिल्ली की आप सरकार द्वारा गार्डन ऑफ़ फाइव सेंसिस में  आयोजित कंसर्ट में मार तमाम  लोगों ने शिरकत किया|       

ट्रोल और ट्रोल-हैंडलर हिंदी भाषा के शब्द नहीं हैं लेकिन अब हिंदी में  काफ़ी प्रचलित हो गए हैं | जबसे मोदी सरकार केंद्र में आयी है और एक के बाद एक राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें बनी  हैं  आए  दिन इन शब्दों से वास्ता पड़ने लगा है | कहते हैं कि भारतीय जनता पार्टी समर्थित ट्रोल-हैंडलर्स काफ़ी आक्रामक हैं और इनकी आक्रामकता को संबल इस बात से मिलता है कि इनको प्रधान मंत्री मोदी फॉलो करते हैं | लीजिए एक और शब्द फॉलो इस कड़ी में जुड़ गया |  ये तीनों नए शब्द एक नए माध्यम के हैं जिसे हम सोशल मीडिया के नाम से जानने लगे हैं | इन ट्रोल-हैंडलरों की आक्रामकता की तुलना यूरोप के पापाराजी फोटो-पत्रकारों से कर सकते हैं जो जिसके पीछे पड़  जाएं, उसका जीना हराम कर दें | पापाराजी पीछे-पीछे, और उसका शिकार आगे-आगे | पापराजिओं के पीछा करने के कारण लोगों की जान भी चली जाती है | ट्रोल हैंडलर्स जानलेवा हमले  करते हैं | वे कोई वैचारिक हमला नहीं करते हैं, छिछोरापन करते हैं और अपने  आक्रामक   छिछोरेपन से एक ऐसी विचारशून्यता पैदा करते हैं कि आप सोच भी नहीं सकते कि आख़िर उस छिछोरेपन का मुक़ाबला कैसे करें | वे एक गुरिल्ला युद्ध छेड़ते हैं तकनीक के सहारे और विचारवान  लोगों को डराने की कोशिश करते हैं | डराना ही उनका मकसद है | एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया के अधिकारी डर गए क्योंकि वे सरकार के मुलाज़िम हैं और मुलाजिमों का काम है सरकार से डरना क्योंकि उन्हें लोगों, संविधान, नागरिक अधिकार, आज़ादी से कोई मतलब नहीं होता, मतलब होता है तो सरकार के हुक्म बजाना | मोदी सरकार की कोई एक उपलब्धि है तो वह है की इसने हुक्म बजा ने वाले अधिकारियों की फ़ौज़  साढ़े चार वर्षों में खड़ी कर दी है |    


ट्रोल की अभद्र टिप्पणियों और धमकाने वाले तेवर से कृष्णा सरीखे  कलाकारों, संगीतकारों और  साहित्यकारों भारत क्या दुनिया के किसी भी हिस्से में डराया-धमकाया नहीं जा सकता | भारत में प्रतिरोध की एक लम्बी परंपरा रही है | अन्याय, दमन, आक्रमण , हिंसा, पाखण्ड के ख़िलाफ़ भारतीय जनमानस हमेंशा उठ खड़ा हुआ है | कबीर सहित सारा संत साहित्य प्रतिरोध का साहित्य है और यह साहित्य गांवों में बसने वाले भारतीयों की जान-भाषा में रचा-बसा है| अपनी बोली-बानी के साहित्य से ग्रामीण जीवन संचालित होता है और उनकी न्याय-व्यवस्था भी इन्हीं परंपराओं पर आधारित है| कला और साहित्य का कोई भी रूप कोई भी शैली प्रतिरोध और नकार पैदा करती है | शहरी लोग थोड़ी देर के लिए भयातुर हो भी जाएं ग्रामीण लोग एक पल के लिए भी भय नहीं खाते और हमेंशा न्याय के पक्ष में खड़े रहते हैं | उनके लंपटपन में भी एक अक्खड़पन रहता है और वही अक्खड़पन उनकी भीतरी ताकत है | डराने की जो नयी तरक़ीब  तकनीक के आधार पर भारतीय जनता पार्टी के ट्रॉलरों ने अख़्तियार किया है, उससे कलाकार-साहित्यकार कहाँ डरेंगे, बल्कि एक मामूली-सा आदमी भी नहीं डरेगा  | सरकार पोषित संस्थाएं डर जाएंगी क्योंकि इन संस्थाओं को गुलाम बनाने की कोशिश भाजपा की सरकार जब से आयी है केंद्र में तब से कर रही है | लेकिन दिल्ली की सरकार और दिल्ली की जनता इन ट्रोलरों से न डरी न डरती है | भाजपा के ट्रोलरों  के दबाव में एयरपोर्ट अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया डर  गयी और टी एस कृष्णा के संगीत के कार्यक्रम को रद्द कर दिया लेकिन दिल्ली  की आप सरकार ने वह कार्यक्रम उसी दिन दिल्ली में कराया|   ये ट्रोलर कृष्णा के राजनितिक विचारों से सहमत नहीं हैं और इनके लिए असहमति कोई मायने नहीं रखता | कृष्णा मोदी सरकार की आलोचना करते हैं जो ट्रोलरों को बिलकुल सहनीय नहीं है | कृष्णा के संगीत में जो समावेशी संदेश है वह भी इन ट्रोलरों  को पसंद नहीं है| अगर सरकार, किसी की भी हो सही काम नहीं करती है, तो उसकी आलोचना तो होगी ही, होनी ही चाहिए | सरकार सोने और मौज करने के लिए नहीं होती है, काम करने के लिए होती है | मोदी सरकार के साढ़े चार वर्ष हो गए और हेर मोर्चे पर नाकामी का सामना कर रही है            |  हिंदी के महान कवि रघुवीर सहाय की एक कविता की एक मशहूर पंक्ति है 'पांच बरस बहुत बरस होते हैं | ' पांच बरस में जो सरकार नाकाम रहती है वह सालों  सत्ता में रह कर भी कुछ नहीं कर सकती है |  
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बुधवार, 21 नवंबर 2018







कविता करते हुए अनायास ही कई बार प्रेमचंद की याद आ जाती है | समझ में नहीं आता ऐसा क्यों होता है | लेकिन यह एक सुखद अनुभव होता है | प्रेमचंद को पढ़ना, उनको समझना, उनके समय की सामाजिक स्तिथियों को महसूस करना, उनके पात्रों की कल्पना करना और आज के तमाम गावों में उन पात्रों  को सजीव देखना  यही बतलाता है हमें कि हमें बहुत बदलना है और स्तिथियों में बदलाव लाना है | विकास के ढिढ़ोरचियों को प्रेमचंद की रचनाओं से बदलाव का पाठ पढ़ना होगा | कवियों और लेखकों की एक संस्था है लिखावट जो है तो अनौपचारिक लेकिन सैकड़ों औपचारिक कविता गोष्ठियों का आयोजन किया है | लिखावट का एक साहित्यिक कार्यक्रम है कैंपस में कविता अर्थात महाविद्यालयों में छात्रों के लिए कविता पाठ आयोजित करना |  दिल्ली के एक महाविद्यालय  
में इसी तरह के कार्यक्रम में मैंने छात्रों से कुछ सवाल किए | पहले मैंने पूछा कि क्या श्रोताओं में सिर्फ हिंदी के ही छात्र हैं या दूसरे विभागों के भी छात्र हैं | जवाब मिला कि संख्या हिंदी वालों की अधिक है लेकिन दूसरे विभागों के विद्यार्थी भी हैं | दूसरा प्रश्न था कि क्या आप लोग प्रेमचंद को जानते हैं | उत्तर मिला कि जानते हैं | अगला प्रश्न था कि आप लोग लमही को जानते हैं | थोड़ी देर की चुप्पी के बाद जवाब आया कि नहीं | मैंने बताया कि लमही प्रेमचंद का गांव है जहाँ रहकर उन्होंने महान रचनाएं रचीं | मेरा आखिरी प्रश्न था कि क्या आपलोग लमही की यात्रा करना चाहेंगे | कोई जवाब नहीं आया | सभागार में खलने वाली चुप्पी थी | मैं स्तब्ध था कि हिंदी के छात्रों में  लमही को लेकर कोई जिज्ञासा नहीं है | लेकिन उसी समय मुझे याद आया कि मैंने भी लमही की यात्रा वर्षों तक नहीं की थी | कई बार बनारस जाना हुआ था लेकिन बगल में बसे लमही गांव जाने की न जरूरत समझा न इच्छा हुई | फिर छात्रों को क्या दोष दूँ | वहीं मुझे 2015 की अपनी बनारस यात्रा की याद आयी | 

उस  बार की वाराणसी यात्रा यादगार रही। कई बार वाराणसी आना-जाना हुआ । हर बार सुनता रहा कि प्रेमचंद का गांव लमही वाराणसी से काफ़ी क़रीब है लेकिन उस गांव न जा पाने के अफ़सोस के साथ लौटता रहा हूं । टैक्सी ड्राइवर से पूछा लमही चलना है। हैरत तो नहीं होनी चाहिए थी यह जानकर कि उसे लमही के बारे में कुछ भी नहीं पता है और कि लमही क्यों प्रसिद्ध है लेकिन मैं  हैरान हुआ | वाराणसी और उसके आस-पास के लोगों को लमही आखिर क्यों नहीं मालूम होना चाहिए क्यों नहीं उन्हें मालूम नहीं होना  चाहिए कि हिंदी भाषा के महान कथाकार प्रेमचंद का वह गांव है जहाँ रहकर उन्होंने कालजयी उपन्यासों और कहानियों का लेखन किया जिन्हें पढ़कर हम बड़े हुए | दुःख इस बात का भी कि उनसे बेहतर मैं कहाँ हूं जो इतने सालों तक प्रेमचंद के गांव लमही जाने की फुर्सत नहीं मिली | दरअसल हमारी परवरिश ही ऐसी होती है कि परिवार में कोई बताता ही नहीं है कि लेखकों के गांव , उनकी विरासत की देखभाल में हमें दिलचस्पी लेनी चाहिए | स्कूल और कॉलेज के दिनों में भी इनके महत्व के बारे में कभी कोई बताता नहीं है | स्वाध्याय से साहित्य की ओर बढे तो प्रेमचंद को जाना | उनकी कहानियां और उपन्यास पढ़ा तो उनके महत्व को जाना | मुझे इतना मालूम था कि लमही वाराणसी के पास ही है | टैक्सी ड्राइवर को  मालूम नहीं था कि लमही  का रास्ता किधर से है । उसने मुझसे  आग्रह किया कि अपने किसी मित्र जिसे लमही का रास्ता पता हो से फ़ोन पर बात करा दीजिए । उसकी लमही के प्रति अनभिज्ञता  से इस बात का पता चला कि प्रेमचंद की जन्मभूमि और साहित्यिक कर्मभूमि भारतीय, उत्तर प्रदेश और वाराणसी के पर्यटन के नक्से पर अपनी जगह नहीं बना पाया है वरना क्या वज़ह है कि जो टैक्सी ड्राइवर सारनाथ, विश्वनाथ मंदिर , गंगा घाटों का पता सहजता से जानता है लमही से अनिभज्ञ है । उत्तर भारतीय समाज अपनी परंपराओं और साहित्यिक विरासतों से जिस तरह आज़ादी के बाद से दूरी बनाता गया है, अपने लेखकों और रचनाकारों से अनजान होते गया है लमही और प्रेमचंद के बारे में टैक्सी ड्राइवर की अज्ञानता से मन पर विषाद का कोई बोझ नहीं पड़ा । उन्हीं  दिनों उत्तर प्रदेश में विधान सभा के लिए चुनाव प्रचार जोरों पर था और हर दल के बड़े-बड़े नेता लोगों से वोट मांगने के लिए प्रचार भाषण कर  रहे थे लेकिन किसी भी दल के नेताओं के भाषणों में उत्तर प्रदेश के साहित्यिक अवदान का कहीं कोई जिक्र नहीं था । विकास और सपनों के सौदागरों को शायद यह नहीं पता कि साहित्यिक-सांस्कृतिक विहीन विकास रचनाशील-मानवीय समाज का निर्माण नहीं  कर सकता । प्रचार भाषणों या चुनावी घोषणा पत्रों में किसी राजनीतिक दल ने यह वादा  नहीं किया कि सरकार बनाने के बाद लमही को राष्ट्रीय -अंतर्राष्ट्रीय पर्यटन स्थल बना देंगे । राजनेता वाराणसी के घाटों पर आरती करने जा रहे हैं लेकिन मात्र दस किलोमीटर दूर लमही की याद किसी को नहीं आती । राजनीति की साहित्यिक सांस्कृतिक दरिद्रता चुनाव के दिनों में और कचोटने लगती है। काश किसी राजनीतिक दल के घोषणा-पत्र में प्रेमचंद के जन्म-स्थान लमही के बारे में कोई योजना होती।  मैंने अपने प्राध्यापक कवि और वाराणसी-निवासी  मित्र संजय श्रीवास्तव से आग्रह किया कि टैक्सी ड्राइवर को लमही जाने का रास्ता बता दें । वाराणसी से लमही की दूरी दस किलोमीटर है। सड़क पक्की है लेकिन बेमरम्मत होने की दशा की वज़ह से काफ़ी ख़राब अवस्था में थी  । टैक्सी में  बैठे महसूस होता रहा कि किसी उबड़-खाबड़ कच्ची सड़क से जा रहे हैं । जबकि बिडम्बना यह है कि प्रेमचंद का स्मारक बनने के बाद लमही गावं की ज़मीन की कीमत आसमान छू रहा है और वाराणसी शहर लमही तक पहुंच गया है ।  
राजनीतिक रूप से यदि फायदेमंद न हो तो राजनेता किसी भी व्यक्ति को याद नहीं करते हैं भले ही वह व्यक्ति किसी भी विधा का विद्वान रहा हो और उसने भारतीय समाज के उत्थान में महती योगदान दिया हो | सरदार पटेल की दुनिया की सबसे ऊँची प्रतिमा लगायी गयी है क्योंकि सरदार का फिलवक्त असरदार राजनीतिक ज़रुरत एक राजनीतिक दल को है | किसी भी राजनीतिक पुरुष की तुलना में किसी साहित्यकार के अवदान को कम कर के नहीं आँका जा सकता है और बात अगर प्रेमचंद की हो रही हो तो यह शत प्रति  शत प्रासंगिक है | प्रेमचंद को याद करने की यहाँ कोई बड़ी वजह नहीं है सिवाय यह रेखांकित करने की कि प्रेमचंद का योगदान साहित्यिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनितिक स्तरों पर  अतुलनीय है | भाषा के स्तर पर खड़ीबोली हिंदी को कहानी और उपन्यास के लिए नयी संवेदना से समृद्ध किया | उत्तर भारत के आज़ादी पूर्व के समाज में फैली हुई जाति -व्यवस्था , भूख आभाव गरीबी और विचार -विहीनता को हमारे लिए अपनी कहानियों और उपन्यासों में दर्ज़ किया | उनके साहित्य में कहानियां कहानियों जैसी नहीं है बल्कि उत्तर भारतीय समाज की तत्कालीन सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना को  झकझोर कर रख देने वाला समाजशात्रीय  साहित्य है |  'कफन', 'गोदान', 'नमक का दरोगा', 'ईदगाह' सरीखे रचनाओं के माध्यम से  गांव में बसे  हिंदुस्तान की तस्वीर को प्रेमचंद ने  देश-दुनिया तक पहुंचाया| चुनाव के दौरान अनाप-शनाप के खर्चे और भ्रम फ़ैलाने वाली  बहसों के बीच किसी राजनीतिक दल को प्रेमचंद याद नहीं आते हैं |  मुंशी प्रेमचंद के गांव लमही को हम उत्तर भारतीय भूल जाएँ तो समझिए हमने अपनी साहित्यिक-सांस्कृतिक विरासत से दूरी बनाने का फैसला कर लिया है| बढ़िया  बात यह हुई है कि लमही में उनके स्मारक पर  उनकी  जयंती  महोत्सव आयोजित होने लगा है |  महोत्सव में  सभी तरह के लोग दिखते हैं और शायद उनके पात्रों सरीखे लोग भी |  पर जयंती के अलावा किसी दिन लमही आप पहुंचे तो वहां की दुर्व्यवस्था देख कर यही लगेगा कि मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर रस्म अदायगी होती रही है| । लेकिन यह भी सच है कि प्रेमचंद के उपन्यास नमक का दरोगा, ईदगाह, सवा सेर गेंहू, कफन, निर्मला पर आधारित नाटक मंचन के दौर में हामिद, घीसू-माधो जैसे चेहरे लोगों के सामने आते रहते हैं । द्वार से तकरीबन डेढ़ किलोमीटर चलने पर सामने आपको मुंशी जी का पैतृक आवास नजर आएगा, वहीं ठीक दूसरी ओर बीएचयू का मुुंशी प्रेमचंद मेमोरियल रिसच सेंटर. पैतृक आवास जिनकी खिड़कियां, बारजे, छोटे छोटे कमरे आज उजली रंगत में चमक रहे हैं जिस घर में कभी प्रेमचंद ने अपनी कालजयी रचनाएं गढ़ीं, कभी न भूलने वाले किरदारों को जना, उसे न जाने कितने साल से म्यूजियम बनाने की तैयारी चल रही है| कई साल  पहले मुंशी जी की 125वीं जयंती पर उनके आवास को म्यूजियम बनाने का दावा किया गया था, लेकिन बीते अनेक वर्षों  में  दीवारों की मरम्मत कर उन पर पुताई ही हुई है| मुंशी जी के घर के ठीक सामने आलीशान मुंशी प्रेमचंद मेमोरियल रिसर्च सेंटर  है जिसका प्रशासन बनारस हिन्दू विशवविद्यालय के अधीन है लेकिन सेंटर और स्मारक के बीच कोई संबंध नहीं दिखता है | रिसर्च सेंटर अभी भी  अपनी सार्थकता सिद्ध नहीं कर पा रहा है जबकि  केंद्र सरकार की पहल पर इस रिसर्च सेंटर की स्थापना इस उद्देश्य से की गई कि यहां मुंशी प्रेमचंद पर, उनके उपन्यास, कहानियों और किरदारों पर शोध हो सके| लोग यह भी बताते हैं कि पहले तो बने बनाए इस भवन के उद्घाटन को दो साल का इंतजार करना पड़ा| शोध क्या होता.साल 2005 से ही लमही को समृद्ध करने की सरकारी कोशिशें की जा रही हैं|  गांव में मुंशी प्रेमचंद नाम से सरोवर भी है जिस पर पहले अवैध कब्जा हो गया था|  जब गांव की सूरत बदलने की सुधी सरकारी तंत्र ने ली तब इस सरोवर को भी कब्जे से मुक्त कराया गया|  गांव के बुजुर्ग लोग कहते हैं  कि हमारे लिए भगवान के बाद कोई है तो वो प्रेमचंद. अगर वो ना होते तो शायद आज हमारा गांव भी गुमनाम होता|  आज यहां जो कुछ है उन्हीं का है|  जिस गांव की कलम से हिंदी उपन्यास जगत में नया इतिहास रचा गया, आज उस विरासत को संभालने वाला कोई नहीं हैं.| गांव में अब भी कफन दुधिया, बूढ़ी काकी और निर्मला जैसे किरदार हैं लेकिन अब उनके दर्द को लिखने वाला कोई नहीं.पैतृक आवास से ही सटे मुंशी प्रेमचंद स्मारक स्थल पर प्रेमचंद स्मारक न्यास लमही की एक छोटी से लाइब्रेरी है, जहां उनकी कहानियों की तिलिस्मी दुनिया बसती है. मुंशी जी के उपन्यासों, कहानियों की किताबों से सजी ये लाइब्रेरी सिर्फ लाइब्रेरी नहीं, बल्कि उनकी कहानियों का मर्म यहां बसता है| किताबों के अलावा यहां आपको ईदगाह का चिमटा भी मिलेगा जो हामिद ने अपनी दादी के लिए खरीदा था|  मुंशी प्रेमचंद का पसंदीदा खेल गिल्ली डंडा भी.| एक छोटे कमरे की लाइब्रेरी में उनकी होली की पिचकारी भी है और हुक्का भी| हामिद की कहानी से प्रेरित विज्ञापन भी अब बनने लगा है | टेलीविजन पर अक्सर एक विज्ञापन दिखाई देता है जिसमें एक गोदाम के भीतर सरिया रखा है और बगल में एक मां रोटियां सेंक रही है | रोटियों को फूलाने में मां की उंगलियां जलने लगाती हैं तो बगल में बैठा रोटी खा रहा  हामिद सरीखा उसका बच्चा उठता है और एक सरिया उठाकर उसे चिमटे का शक्ल देकर अपनी माँ  को देता है और मां  खुश होती है और उसी चिमटे से रोटी को पकड़ कर आग पर फुलाती है| प्रेमचंद ने हमें अनेक स्तरों पर प्रभावित किया है इस विज्ञापन से समझा जा सकता है | कई ऐसी रचनाएं भी आपको यहां मिलेंगी जो कभी पूरी न हो सकीं और वो भी जिन्हें प्रतिबंधित कर दिया गया. 1909 में  उनकी लिखी 'सोजे वतन' की वो प्रति भी है जिसे अंग्रेजों ने जला दिया था| 'समर यात्रा' दिखेगा जिसे अंग्रेजों ने प्रतिबंधित कर दिया था| 'मंगलसूत्र' दिखेगा  जो अधूरी रह गई. प्रेमचंद की कहानियां, उपन्यास साहित्य के अनमोल धरोहर हैं| 


विस्मृति के ख़िलाफ़ एक लम्बा जंग लड़ने की ज़रूरत 

विस्मृति के ख़िलाफ़ एक लम्बा जंग लड़ने की ज़रूरत है, ख़ास के जब ऐसा जंग साहित्य में लड़ने की हो | हमारा उत्तर भारतीय समाज अपने साहित्यकारों और संस्कृतिकर्मियों को याद रखने की जोहमत बहुत कम उठता है | हमारे  समय के महँ कवि  कवि रघुवीर सहाय को अब उनके जन्मदिन पर भी लोग याद नहीं करते जबकि उनको मरे केवल अठ्ठाइस वर्ष ही हुए | उनके जैसे कवि को दिसंबर महीने में हर साल शहर शहर याद किया जाना चाहिए | रघवीर सहाय का जन्म नौ दिसंबर, १९३१  लखनऊ शहर में हुआ इसलिए वे लखनऊ के हैं, फिर दिल्ली आ गए और इसी दिल्ली में तीस दिसंबर, १९९० को उनका देहावसान हुआ | लखनऊ और दिल्ली शहर कम से कम उन्हें याद करें लेकिन नहीं, हम घनघोर रूप से  समकालीनता से घिर गए हैं और आत्मुग्धता से भी, ऐसे में अगर कोई किसी को याद करता है तो वह उसका बड़ा काम दिखने लगता है |    स्वर्गीय जगदीश चंद्र माथुर का  यह जन्मशती वर्ष है जो चुपचाप उनको याद किये बगैर निकालता चला जा रहा है | एक समाज के  रूप में यह भी हमारी साहित्यिक और  सांस्कृतिक दरिद्रता की निशानी है | अगर उनके  जीवन वृत्त पर एक नज़र हम डालें तो पाएंगे कि उनका जन्म १७ जुलाई, १९१७ के दिन उत्तर प्रदेश के खुरजके शाहजहांपुर में हुआ था, तो इस तरह से उनकी जन्मशती मनाने के सबसे पहला दायित्व उत्तर प्रदेश सरकार की है लेकिन वर्तमान सरकार को मंदिर , मूर्ति और प्रतिमाओं से फुर्सत कहाँ है| एक आदमकद मूर्ति के हकदार माथुर जी भी हैं, अगर उनके साहित्यिक-सांस्कृतिक अवदान को गंभीरता से लिया जाए | १९४१ में आई सी एस की परीक्षा पास कर सिविल सेवा में आ चुके थे और अपने प्रशासनिक जीवन का अधिकांश हिस्सा बिहार में बिताया| १९४९ से १९५५ तक क़रीब छह साल बिहार के शिक्षा सचिव रहे, और नाम के शिक्षा सचिव नहीं रहे बल्कि बिहार के साहित्यिक-सांस्कृतिक उत्थान के लिए कई साहित्यिक- सांस्कृतिक  संस्थाओं के जन्मदाता रहे, उनकी जन्मशती मनाने की कोशिश बिहार सरकार को भी करनी चाहिए थी | बिहार सरकार उत्तर प्रदेश की सरकार से थोड़ा हट के तो  है ही | क़ाबिलेगौर  बात यह है कि माथुरजी आकाशवाणी छह साल महानिदेशक भी रहे और कहते हैं कि ऑल इंडिया रेडियो को आकाशवाणी का नाम उन्होंने ने ही दिया था, उनकी जन्मशती मनाने की एक जिम्मेवारी  सरकार की भी है और कम से कम उनकी एक आदमकद प्रतिमा दिल्ली के आकाशवाणी परिसर में लगनी ही चाहिए लेकिन यह भी ग़ौरतलब है कि उनकी प्रतिमा लगाने या जन्मशती मनाने से सरकारों को कोई राजनितिक लाभ तो मिलाना नहीं है क्योंकि उत्तर भारतीय लोग अपने साहित्यकारों को चाहते ही कितना है | मुझे नहीं पता कि आकाशवाणी ने  उन्हें इस जन्मशती वर्ष में याद किया कि नहीं !    माथुर जी को इस साल शिद्दत से याद किया अनभै साँचा नाम की एक  अनियतकालीन साहित्यिक पत्रिका ने पूरी नीयत और लगन से | 

अनभै साँचा दिल्ली से निकलने वाली साहित्यिक और सांस्कृतिक  पत्रिका है | इसके संपादक की कोशिश रहती है की इसका अंक बिना नागा तीन महीने पर निकल जाए लेकिन संसाधन की कमी अक्सर इसे अनियतकालीन पत्रिका बना देती है | इसके संपादक द्वारिका प्रसाद चारुमित्र  हैं जो दिल्ली विश्वविद्यालय में हिंदी भाषा और साहित्य के प्राध्यापक पद से अवकाशप्राप्त हैं | दिल्ली में रहते हैं और जिद्द पर अड़े रहते हैं कि पत्रिका निकालनी ही है |  इस काम में दिल्ली विश्वविद्यालय के कई युवा प्राध्यापक उनको सहयोग करते हैं जैसे कि विक्रम सिंह, बली सिंह, मनोज कुमार सिंह इत्यादि| ये लोग दिल्ली विश्वविद्यालय के विभिन्न महाविद्यालयों में प्राध्यापन का कार्य करते हैं  |  चारुमित्र ने अपने अनथक प्रयास और परिश्रम से कई संग्रहणीय अंक निकाले हैं  | शमशेर बहादुर सिंह  के जन्मशती वर्ष में उनपर केंद्रित अनभै साँचा का विशेषांक संग्रहणीय है | यह अक्टूबर-दिसंबर, 2011 का अंक  है | अनभै साँचा का जुलाई-दिसंबर, 2016 का अंक प्रख्यात आलोचक डॉ विश्वनाथ त्रिपाठी पर केंद्रित है | ऐसे ही संग्रहणीय अंकों की कड़ी में चारुमित्र ने अनभै साँचा के जनवरी-जून, 2018 अंक को स्वर्गीय जगदीश चंद्र माथुर पर केंद्रित किया है | माथुर जी का यह जन्मशती वर्ष है लेकिन भाषा और साहित्य में उनके अवदान को याद करने की फूर्सत इस बृहत्तर हिंदी समाज को नहीं मिली | माथुर जी को याद करने का काम अकेले अभी तक अनभै साँचा ने किया है 168 पृष्ठों का उन पर केंद्रित अंक निकाल कर |

माथुर जी की ख्याति एक सफल नाटककार की रही है | वे बड़े नाटककार तो थे ही, एक बड़े रंगचिंतक और नात्यालोचक भी थे | ध्यान देने की बात यह भी है कि वे एक कुशल प्रसाशक और संस्था-निर्माणक भी थे | बिहार में शिक्षा-सचिव रहे और अपने कार्य-काल के दौरान वैशाली-महोत्सव, बिहार राष्ट्र-भाषा परिषद्, प्राकृत जैन-शास्त्र, अहिंसा शोध संस्थान, काशीप्रसाद जायसवाल शोध संस्थान, मिथिला-संस्कृत शोध संस्थान, अरबी- फ़ारसी  शोध संस्थान , नेतरहाट विद्यालय सरीखे संस्थानों का निर्माण करवाया | वैशाली महोत्सव का उन्होंने अपने एक लेख में विशेष रूप से जिक्र किया है |  वे लिखते है कि वैशाली प्रजातंत्र की न्याय व्यवस्था बहुत सिलसिलेवार और सुंदर थी | बौद्धों के सुप्रसिद्ध धर्मग्रंथ 'दीध निकाय ' के हवाले से वे बतलाते हैं कि वैशाली के प्रजातंत्री काज्जिगण बार-बार अपनी सभाएं करते हैं , सभाओं में मिलकर बहुमत से निर्णय लेते हैं; एक राय से काम, करते हैं, उठते-बैठते हैं ; वैशाली के नियमों और विधान के विरुद्ध काम नहीं करते; अपने बड़े-बूढ़ों का सम्मान करते, और उनकी बात पर कान देते हैं ;स्त्री और कन्याओं पर अत्याचार और ज़बरदस्ती नहीं करते ; जातीय मंदिरों की देख-रेख करते हैं और धर्माचार्यों के सुभीते का ध्यान रखते हैं | ये सातों सिद्धांत  सरकारों के लिए मार्ग-दर्शक हैं एक धर्म-निरपेक्ष सर्व-धर्म हिताय लोक-कल्याणकारी सरकार चलाने के लिए लेकिन तीनों सरकारें 'दीध निकाय ' के केवल जातीय मंदिरों की देख-रेख और  धर्माचार्यों के सुभीते का ध्यान ही रख रहे हैं | वैशाली की शक्ति के मूल-मंत्र थे ये सातों सिद्धांत  | कह सकते हैं की किसी भी लोकतंत्र की नींव इन्हीं  आधारित हैं | वे लिखते हैं कि इन आदर्शों की स्मृति को पुनर्जागरत करने और सामूहिक आमोद-प्रमोद के वातावरण को स्थापित करने के विचार से ही, सन १९४५ से प्रति वर्ष जनसाधारण का एक महोत्सव, वैशाली महोत्सव के नाम से वैशाली के खण्डहरों के पास ही मनाया जाता है |     वर्ष 1955 में आकाशवाणी के महानिदेशक बने तो आकाशवाणी को भारतीय संस्कृति के सच्चे वाहक का रूप दिया | कहते हैं आल इंडिया रेडियो को आकाशवाणी का नाम उन्हीं का दिया हुआ है | इस पत्रिका के संपादक के शब्दों में कहें तो कहना होगा, " अनभै साँचा का यह अंक जगदीश चंद्र माथुर जैसे महत्त्वपूर्ण सर्जक और संस्कृतकर्मी के उचित मूल्यांकन का मार्ग प्रशस्त करेगा | "

अनभै साँचा के इस अंक में जगदीश चंद्र माथुर पर अनेक ऐसे आलेख हैं जो उनके नाट्यकर्म पर समुचित प्रकाश डालते हैं | प्रसिद्ध रंग-निर्देशक देवेंद्र राज अंकुर के आलेख 'कोणार्क : आज़ादी के बाद का पहला रंगमंचीय नाटक ' में माथुर जी के नाटक कोणार्क के रोमांचक  प्रस्तुतियों का एक सरस इतिहास है | अपने समय के सच को अभिव्यक्त करने के लिए माथुर जी ने मध्यकालीन इतिहास से रूपक उठाया | देवेंद्र राज अंकुर अपने लेख में लिखते हैं, "शायद इसीलिए रचनाकार बार-बार इन स्त्रोतों की ओर लौटते हैं, क्योंकि यहां पहले से कथा का एक प्रचलित एवं  प्रचारित रूप उपस्थित है | अतः उसके लिए यह सुविधा हो जाती है कि वह उसमें से क्या नया खोज कर लाए कि वह उसे अपने समय की आहटों, पदचापों एवं प्रतिध्वनियों से तो जोड़ ही सके, साथ-साथ अपने शाश्वतपन के कारण  हर युग में उसकी सार्थकता बानी रहे | " शाश्वतपन की सार्थकता माथुर जी के 'कोणार्क ' में  देखी  जा सकती है | देवेंद्र राज अंकुर आगे लिखते हैं, " मेरे विचार में नाटक में संवादों का साहित्यिक होना या ना होना उतना मायने नहीं रखता, जितनी यह अपेक्षा या संभावना कि वे अपने भीतर में कितने नए बिम्ब और कितने नए अर्थ व्यंजित कर रहे हैं | इस लिहाज से कोणार्क के संवाद सफल नाटकीय संवाद हैं | " अंकुर जी के शब्दों में हिंदी रंगमंच में एक नयी शैली की खोज और पूरी तरह से भारतीय यथार्थवाद की प्रस्तुतिपरक अवधारणाओं एवं संभावनाओं के प्रतीक रूप में 'कोणार्क ' का महत्त्व सदैव अक्षुण्ण रहेगा | 
रंग आलोचक प्रताप सहगल जगदीश चंद्र माथुर  को आज़ादी के बाद हिंदी नाटक एवं रंगमंच के अग्रदूत मानते हैं | जगदीश चंद्र माथुर हिंदी नाटक और रंगमंच के क्षेत्र में उस समय प्रवेश करते हैं, जब हिंदी रंगमंच एकदम निष्क्रिय था | उनकी इसी पहल के कारण माना जा सकता है कि 'आधुनिक रंगमंच के जनक भारतेन्दु के बाद फिर एक नयी शुरुआत करने वाले जगदीश चंद्र माथुर ही थे | ' नाटक लिखते हुए वे दृश्य विधान और रंगमंच के स्वरुप आदि की परिकल्पना भी करते चलते थे | डॉ विक्रम सिंह मानते हैं कि जगदीश चंद्र माथुर ने नवीन  नाट्य-चेतना तथा सृजनात्मक रंग-दृष्टि से हिंदी नाट्य साहित्य को समृद्ध बनाने में योगदान दिया है |    इस अंक में बहुत कुछ पठनीय है | विख्यात  कवि स्वर्गीय  शमशेर बहादुर सिंह की स्वर्गीय जगदीश  चंद माथुर पर लिखी एक कविता है | माथुर जी पर लिखा अमृत लाल नागर का लिखा एक लेख है | अमृत लाल नगर लिखते है कि कोणार्क एक पत्रिका में प्रकाशित हुआ था तभी से उसकी धूम मच गयी थी |       

शनिवार, 13 अक्टूबर 2018




कविता पढ़ने की विधा है या बोलने की 


कविता पढ़ने की विधा है या बोलने की | जब छपने की सुविधा नहीं थी तब कविता बोल कर पढ़ी जाती थी और याद रखी जाती थी | पीढ़ी दर  पीढ़ी कविता को स्मृतियों के सहारे बचायी गयी | विडंबना देखिए की छपाई की बेहतर सुविधा के साथ-साथ कविता को पढ़ने की विधा बना देने की कोशिश हुई है और इस कोशिश में रचनाकार सफल भी हो गए हैं | कविता लिखी गई, पत्र-पत्रिकाओं में और पुस्तक रूप में छाप गयी और लोगों को पढ़ने के लिए पाठक को कविता परोस दी गयी | लेकिन कविता का सौंदर्य दरअसल निखरता है जब वह बोल कर पढ़ी जाती है | कविता लिखते समय कवि के संवेदना में जितनी कविता-सामग्री होती है वह सब के सब लिखित कविता में अभिव्यंजित हो नहीं पाती | कवि के भीतर के क्रन्दन उल्लास भावनाएं भाव-भंगिमाएं भाषा में अभिव्यक्त होने से वंचित रह जाते हैं | कई प्रकार की ध्वनियां और उद्वेग , मौन, दो शब्दों के बीच की  खली जगह कवि अपने पाठ से  भरता है | कविता के सारे अवयव कवि की बोल कर पढ़ी गयी कविता में उभरती है जब वह सचमुच कविता ठीक से पढ़ना जानता है | कविता पढ़ने की कला तब निखरती जब एक कवि को कविता पढ़ने के बहुत सारे अवसर मिलते हैं | कविता पढ़ते-पढ़ते वह अपनी छंदमुक्त कविता के भीतर के लय और छंद को पकड़ पाता है, दो शब्दों के बीच के मौन को पकड़ पाता है | अपनी सांस के उतार-चढ़ाव को साध पाता है | कविता पढ़ना एक साधना है जिसका कहीं विधिवत प्रशिक्षण नहीं दिया जाता है जैसे संस्कृत वैदिक श्लोकों के उच्चारण का प्रशिक्षण दिया जाता है | कविता को कवि को खुद साधना पड़ता है जिसके लिए जरूरी है कि उसे कविता पढ़ने का अवसर बार-बार मिले | ऐसे अवसर साहित्य अकादेमी, हिंदी अकादेमी, रजा फाउंडेशन या ज्ञानपीठ सरीखे संस्थान नहीं दे सकते | ऐसे अवसर खुद के प्रयास से ही मिल सकते हैं | कविओं के समूह लिखावट लगातार कविता पाठ के ऐसे अवसर की तलाश कर रहा है और अपने से जुड़े मित्र कवियों को कविता-पाठ  का अवसर दे रहा है | इसके बड़े कविता-अभियानों में कैंपस में कविता है जहाँ कवि आ रहे है और कविता पढ़ रहे हैं | लिखावट ने देशबंधु, आत्माराम सनातनधर्म, राजधानी महाविद्यालयों में और दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर में एक के बाद एक कविता-पाठ आयोजित किया है और अन्य महाविद्यालयों में ऐसे काव्य-पाठ आयोजित करेगा | लोगों के बीच जाकर कविता पढ़ने का आनंद ही अलग है | कई कवि बार बार कविता पढ़ रहे है नतीजतन उनके वाचन में अप्रत्याशित अंतर महसूस किया गया है | देशबंधु महाविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर और कवि और आलोचक मनोज कुमार सिंह के कविता वाचन  में जो निखार आया है  उससे इस बात की पुष्टि होती है कि वाचन कितना ज़रूरी है | आज के अनेक चर्चित युवा कविओं के वाचन भयानक रूप से दोषपूर्ण हैं |  

सोमवार, 8 अक्टूबर 2018

दो कविताएं -मिथिलेश श्रीवास्तव 
बुरा  मानूंगा   

उसने  मान लिया था कि किसी की बात का बुरा नहीं मानूंगा 
यह देश इतना बेगाना है कि उसके  मन को चोट पहुंचाए बिना 
कभी कोई बात करता नहीं तो बुरा क्या मानना 
उसने  अपने आप को संत मान लिया था 
संत! एकबारगी हंसी आयी उसे  अपने आप पर 
लोगों  की बातें  बुरी तो लगती रही हैं 
बुरी लगने की बात मन में दबाए अपने आप को छल रहा था
मन बहलाने की ख़ातिर कभी किसी को दोस्त कह दिया 
कभी कह दिया चलो माफ़ किया 
ख़राब सपने की मानिंद भुलाने की कोशिश करता रहा 
छल का जवाब छल से नहीं दिया जाता वह मन को समझाता रहा 
भई मन तो मन है कब तक समझता रहेगा 
एक दिन विद्रोह होना ही था 
उसने आकाश की ओर हाथ उठाया और चिल्लाया सड़क साफ़ करो 
गली को धो डालो मलबे को उठाकर कहीं फेंक आओ  
उन लोगों का   क्या करोगे  जो रात दिन फेंके हुए मलबे को 
अपने दिमाग में भर कर दुनिया को अपनी उंगली पर नचाने लगते हैं

उनका दोष नहीं  

उनका दोष नहीं वे चाहते थे कि जहां जो हो रहा है 
उसकी ख़बर उनको भेजूं ताकि समय रहते वे कोई ठोस कदम उठा सकें 
मैंने लिखा यहां अंधेरा बहुत है उन्होंने पूछा लिखते समय घडी क्या बजा रही है 
कलाई पर बंधी घड़ी मैंने देखी और कहा रात के आठ बजे हैं 
वे हंसे और बोले रात के आठ बजे अँधेरा नहीं होगा तो क्या उजाला होगा 
जाओ किसी उजाले वाले इलाके में और सुबह होने का इंतजार करो 
उजाले वाले इलाके ढूढ़ते ढूढ़ते भोर हो गयी 
मैंने लिखा भोर हो गयी है और शहर के एक इलाके में इक्कट्ठे होकर लोग नौकरी मांग रहे हैं 
वे फिर हंसे और बोले उनसे जा कर कहो अभी भोर नहीं हुई है, जाकर सो जाएं 
मैंने पूछा मैं क्या बोलूं अगर वे पूछते हैं उठने का समय 
वे हंसे और बोले कहो कि वे लोग हैं उनका उठना पांच साल पर मुनासिब होगा  

शनिवार, 6 अक्टूबर 2018

परिचित आवाज़ें



परिचित आवाज़ें

फाउंडेशन ऑफ़ सार्क राइटर्स & लिटरेचर (फोसवाल ) का इन दिनों साउथ एशियाई लिटरेचर फेस्टिवल नई दिल्ली में चल रहा है | उद्घाटन 4 अक्टूबर 2018 को साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष प्रोफेसर चंद्रशेखर कम्बार ने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के कमलादेवी काम्प्लेक्स में किया | इस अवसर पर प्रोफेसर आशीष नन्दी , मुचकुन्द दुबे, अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश, भुटान, नेपाल, और श्रीलंका के भारत में राजदूत /उच्चायुक्त उपस्थित थे | लगभग 200 कवि, लेखक और विभिन्न विषयों के विद्वान इन देशों से आ चुके हैं और फेस्टिवल के विभिन्न सत्रों में अपनी-अपनी रचनाओं का पाठ कर रहे हैं | दूसरे, तीसरे और चौथे दिन अर्थात 5, 6 और 7 अक्टूबर, 2018 को कार्यक्रम अकादेमी ऑफ फाइन आर्ट्स एंड लिटरेचर के परिसर ४/६, सीरी फोर्ट इन्टीटूशनल एरिया, नई दिल्ली में संपन्न हो रहा है | अपने स्वागत भाषण में फोसवाल की अध्यक्षा अजीत कौर ने वाज़िब ही कहा कि " दक्षिण एशिया के लोग आपस में बहुत ही मज़बूती से जुड़े हुए हैं , हमारी परंपराएं, हमारे तीज-त्यौहार, लोक-ज्ञान की पद्धति और लोक-गीतों इत्यादि में काफी कुछ साझा है |" सच है कि सीमाएं, सरहदें और सरकारें हमें एक-दूसरे से अलग-थलग नहीं कर सकतीं | हम लेखकों और कवियों को अपनी साझी विरासत की पहचान हमेंशा करते रहना चाहिए|
याद रखें, रविवार (7 अक्टूबर, 2018 ) को चौदहवें सत्र (12.10 बजे से ) की अध्यक्षता मैं करूँगा जिसमें मेरे सहित नौ कवि अपनी कविताओं का पाठ करेंगे - तीन कवि बांग्लादेश से और ६ छह कवि अपने देश की विभिन्न भाषाओँ से | आने की कोशिश करिए | इस सत्र में मुझे यह लाभ होगा कि हिंदी भाषा शायद सभी शिरकत करने वाले कवियों द्वारा समझी जाएगी | फिर भी जैसा कि अजित कौर जी का सुझाव था कि सभी लोग पढ़ी जाने वाली रचनाओं का अंग्रेजी अनुवाद ज़रूर ले आएं तो इस शर्त की वज़ह से मुझे उन कविताओं का चुनाव पहले ही कर लेना पड़ा है जिनका कल मैं पाठ करूंगा | इस काम को मेरे कवि मित्र संजीव कौशल ने आसान कर दिया| संजीव कौशल एक बेहद ज़हीन व्यक्ति हैं और मित्रता को अहमियत देते हैं | वे दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में अंग्रेजी भाषा और साहित्य पढ़ाते हैं और कई हिंदी साहित्यकारों की रचनाओं का अनुवाद अंग्रेजी में किया है | मैंने उनसे अनुरोध किया कि वे मेरी कविताओं का अनुवाद इस अवसर के लिए कर दें | उन्होंने मेरे आग्रह पर खुद ही मेरे पहले कविता-संग्रह " किसी उम्मीद की तरह " में से दो कविताएं चुन कर उनका अंग्रेजी में अनुवाद कर दिया है | मेरी इन कविताओं को मेरे संग्रह में पढ़ सकते हैं | यह संग्रह पंचकुला के आधार प्रकाशन ने छापा है | मैं यहाँ संजीव कौशल के द्वारा अंग्रेजी में अनूदित कविताएं दे रहा हूँ:
Familiar Sounds ( परिचित आवाज़ें )
Sounds that are familiar frighten
Lightning surrounded by clouds frighten
Closing of a door on second floor
Shakes my apartment on the first
Sound of the ball of a playing child
Almost frightens the lower floor
Sound of running footsteps
Incites fear every night
Of door being knocked at
Sound from second to the first floor
Seems coming from a distance
There is a mother growing old somewhere in the distance
An unemployed brother who reaches home late
Sometimes doesn't return at all
Slips into bed when returns
Avoids dreaming and babbling in sleep
There is a sound of these as well.
.
Bonsai (बोंसाई )
We have learnt many arts
In modern times
Bonsai is one of them
The Earth is placed in a flower pot
Trees whose roots run deep
Gather these roots within pots
The size of a banyan tree
Is shrinking like humans
This art is not applicable
On man
Man has no roots
His size shrinks easily
Man shows no signs of protest against shrinking
This art has developed even further
Man can reduce
Anybody's size
Gathered roots and branches
Spread within a banyan tree
It appears huge even in a pot
Man is fascinated
But bonsai laughs
इधर हमने अनेक जगहों पर कविता पाठ किया है | 17 सितम्बर , 2018 - देशबंधु महाविद्यालय में लिखावट के कैंपस में कविता ; 26 सितम्बर , 2018 -आत्मा राम सनधान धर्म महाविद्यालय में लिखावट के कैंपस में कविता ; 29 सितम्बर , 2018 - डॉयलाग में कविता-पाठ ; 5 अक्टूबर , 2018 - राजधानी महाविद्यालय में लिखावट के कैंपस में कविता ; 7 अक्टूबर , 2018 को साउथ एशियाई लिटरेचर फेस्टिवल में कविता-पाठ होगा
  

शनिवार, 13 जुलाई 2013

इतनी सारी हत्याएं

मिथिलेश श्रीवास्तव

पाब्लो नेरुदा की हत्या हुई थी । उनके मरने के चार दसक अर्थात चालीस बरसों के बाद जांच शुरू हो चुकी है ।। तब कहा गया था कि उनकी मृत्यु कैंसर से हुई थी । चिली के तब के तानाशाह अगस्तो पिनोचेट के आदेश पर यह हत्या हुई थी, ऐसा संदेह है । चिली जहाँ के नेरुदा थे, के बारे में कहा जता है कि वहाँ के लोग अपने आदर्श पुरुषों का आदर नहीं करते और उनकी टांग खिचाई करते हैं । भारत के लोगों खास कर के हिंदी वालों का स्वाभाव चिलीवासियों से हु-ब -हु मिलता  है ।  वे भी अपने आदर्श पुरुषों मसलन लेखकों, कविओं, कलाकारों के साथ चिलीवासिओं की तरह ही पेश आते हैं । एक अच्छा लिखता है तो दूसरा जल उठता है । एक को पुरस्कार मिलता है तो दूसरा सीने पर हाथ रखकर आल इज वेल कहने लगता है । पाब्लो नेरुदा की हत्या की जांच तो हो रही है , चालीस बरसों बाद ही सही । यहाँ रोज़ हत्याएं होती हैं , हत्या की कोशिश होती है और मज़ाल की कोई चू तक करे । 

मिसाल के तौर पर अज्ञेय  की हत्या करने की कोशिश बरसों से की जा रही है । उनके विपुल साहित्य को एक सिरे से खारिज़ करने की कवायद की तुलना आतंकवादी हमले से की जा सकती है । लेकिन अज्ञेय के लेखन की शक्ति है कि हमलों के बीच से वे फिर खड़े हो उठते हैं, बैसाखी के बगैर । हत्या की इस कोशिश के विरुद्ध कुछ कारगर आवाजें  हमेंसा उठती हैं लेकिन इसकी कोई जांच नहीं होती । रघुवीर सहाय की हत्या की कोशिश और पुरजोर ढंग से होती है । पहले पूछा जता है रघुवीर सहाय मार्क्सवादी हैं । हत्या की कोशिश के पहले रघुवीर सहाय को पढो तो सही । रघुवीर सहाय कहा करते थे कि वे आवाक हैं कि रघुवीर सहाय काम तो मार्क्सवादियों वाले करते हैं, लेकिन अपने आप को मार्क्सवादी नहीं कहते । अब रघुवीर सहाय से बढ़ कर जन कवि कौन हो सकता है जो मर तमाम लोगों को आगाह करते रहे कि हत्या होगी । जिस दिन दिनमान के संपादन से उन्हें विमुक्त कर दिया गया था उस दिन हमने कहाँ पूछा था कि एक नया मनुष्य बनाने के अभियान पर निकले एक कवि को  दिनमान से क्यों विमुक्त कर दिया गया । यह वही समय था जनता पार्टी की सरकार बिखर गयी थी, जय प्रकाश नारायण के संचालन में चले आन्दोलन अपने पराभव पर था और इंदिरा गाँधी की वापसी हो चुकी थी । समाज ने मान लिया कि वैचारिक विमर्श का समय ख़त्म हो गया और दिनमान को अस्त हो जाने दिया । दिनमान के पतन, दिनमान से रघुवीर सहाय का निष्कासन भी हमारे लिए आन्दोलन की वजह होना चाहिय था जो कि नहीं हुआ । क्या हमारी आखों के सामने हत्या होने के सदृश्य नहीं है यह ? अज्ञेय भी खूब पढ़े जा रहे हैं और रघुवीर सहाय भी । रघुवीर रचनावली अब उपलब्ध नहीं है, ऐसा बताते है। निर्मल वर्मा की भी हत्या की कोशिश हुई है जब उन्हें संघी कहा गया । 
रविन्द्र नाथ ठाकुर की हत्या की नई  कोशिश शुरू हो चुकी है । शुरुआत कन्नड़ लेखक गिरीश कर्नाड ने यह कह के किया कि ठाकुर के नाटक दोयम दरजे के हैं । अब  विष्णु खरे ने कहा है कि रविन्द्र नाथ ठाकुर को पढ़ता कोई नहीं है और उनका लेखन अंग्रेजी अनुवाद में दोयम दर्जे का लगता है । यह तो हद हो गई । विष्णु खरे से पूछा जाना चाहिए कि आखिरकार कौन से लेखक सच्चे मायने में पढ़े जाते हैं या पढ़े जा रहे हैं । किसी किताब की पांच सौ प्रतियां सरकारी खरीद के जरिय बेंच कर प्रकाशक हो रहे है मालामाल और लेखक वैसे के वैसे । विष्णु खरे, अशोक वाजपेयी, लीलाधर   जगूड़ी के मन में कहीं न कहीं यह कशक होगी ही  कि उनके लिए भी सुपारी दी गयी है तभी तो उनके साहित्यिक अवदान को तवव्जो जो मिलनी चाहिय मिल नहीं रही है। उदय प्रकाश तो घायल मन पड़े ही है। शिल्पायन सानिध्य में शामिल कविओं को तो भुन डालने की ही कोशिश की गयी थी । 

वार दोनों तरफ से हो रहे हैं । शीतयुद्ध के बाद वार का रूप आक्रामक हो गया है । सहनशीलता, सहिष्णुता, विराटता, उदारता तिरोहित हो रहे हैं । ऐसा क्यों हो रहा है शायद इसलिय कि दुनिया एकध्रुवीय हो गयी  है और साहित्य इस एकध्रुवीयता  के संकट को तो देख रहा है लेकिन इसकी ऐतिहासिक अनिवार्यता को स्वीकार करने से बच रहा है।    एकध्रुवीयता ने हमें स्वदेशी की परिभाषा को जानने समझने का एक अच्छा मौक़ा दिया है जिसको हम अपनी निरंतरता से जोड़  कर देख सकते हैं । रविन्द्र नाथ टैगोर ने इंसानियत की इसी निरंतरता के सौंदर्य को देखा और संगीतमय कविता में अभिव्यक्त किया जिसे सारे संसार में माना गया । वे ठाकुर थे, राजघराने से थे, रसूखदार लोगों का अंग्रेजी हुकुमत के साथ दोस्ती भी निभती थी  । वे इतने संपन्न थे कि वे अपनी रचना रसूखदारों के बीच ले कर जा सकते थे ।