सोमवार, 8 अक्टूबर 2018

दो कविताएं -मिथिलेश श्रीवास्तव 
बुरा  मानूंगा   

उसने  मान लिया था कि किसी की बात का बुरा नहीं मानूंगा 
यह देश इतना बेगाना है कि उसके  मन को चोट पहुंचाए बिना 
कभी कोई बात करता नहीं तो बुरा क्या मानना 
उसने  अपने आप को संत मान लिया था 
संत! एकबारगी हंसी आयी उसे  अपने आप पर 
लोगों  की बातें  बुरी तो लगती रही हैं 
बुरी लगने की बात मन में दबाए अपने आप को छल रहा था
मन बहलाने की ख़ातिर कभी किसी को दोस्त कह दिया 
कभी कह दिया चलो माफ़ किया 
ख़राब सपने की मानिंद भुलाने की कोशिश करता रहा 
छल का जवाब छल से नहीं दिया जाता वह मन को समझाता रहा 
भई मन तो मन है कब तक समझता रहेगा 
एक दिन विद्रोह होना ही था 
उसने आकाश की ओर हाथ उठाया और चिल्लाया सड़क साफ़ करो 
गली को धो डालो मलबे को उठाकर कहीं फेंक आओ  
उन लोगों का   क्या करोगे  जो रात दिन फेंके हुए मलबे को 
अपने दिमाग में भर कर दुनिया को अपनी उंगली पर नचाने लगते हैं

उनका दोष नहीं  

उनका दोष नहीं वे चाहते थे कि जहां जो हो रहा है 
उसकी ख़बर उनको भेजूं ताकि समय रहते वे कोई ठोस कदम उठा सकें 
मैंने लिखा यहां अंधेरा बहुत है उन्होंने पूछा लिखते समय घडी क्या बजा रही है 
कलाई पर बंधी घड़ी मैंने देखी और कहा रात के आठ बजे हैं 
वे हंसे और बोले रात के आठ बजे अँधेरा नहीं होगा तो क्या उजाला होगा 
जाओ किसी उजाले वाले इलाके में और सुबह होने का इंतजार करो 
उजाले वाले इलाके ढूढ़ते ढूढ़ते भोर हो गयी 
मैंने लिखा भोर हो गयी है और शहर के एक इलाके में इक्कट्ठे होकर लोग नौकरी मांग रहे हैं 
वे फिर हंसे और बोले उनसे जा कर कहो अभी भोर नहीं हुई है, जाकर सो जाएं 
मैंने पूछा मैं क्या बोलूं अगर वे पूछते हैं उठने का समय 
वे हंसे और बोले कहो कि वे लोग हैं उनका उठना पांच साल पर मुनासिब होगा  

शनिवार, 6 अक्टूबर 2018

परिचित आवाज़ें



परिचित आवाज़ें

फाउंडेशन ऑफ़ सार्क राइटर्स & लिटरेचर (फोसवाल ) का इन दिनों साउथ एशियाई लिटरेचर फेस्टिवल नई दिल्ली में चल रहा है | उद्घाटन 4 अक्टूबर 2018 को साहित्य अकादेमी के अध्यक्ष प्रोफेसर चंद्रशेखर कम्बार ने इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के कमलादेवी काम्प्लेक्स में किया | इस अवसर पर प्रोफेसर आशीष नन्दी , मुचकुन्द दुबे, अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश, भुटान, नेपाल, और श्रीलंका के भारत में राजदूत /उच्चायुक्त उपस्थित थे | लगभग 200 कवि, लेखक और विभिन्न विषयों के विद्वान इन देशों से आ चुके हैं और फेस्टिवल के विभिन्न सत्रों में अपनी-अपनी रचनाओं का पाठ कर रहे हैं | दूसरे, तीसरे और चौथे दिन अर्थात 5, 6 और 7 अक्टूबर, 2018 को कार्यक्रम अकादेमी ऑफ फाइन आर्ट्स एंड लिटरेचर के परिसर ४/६, सीरी फोर्ट इन्टीटूशनल एरिया, नई दिल्ली में संपन्न हो रहा है | अपने स्वागत भाषण में फोसवाल की अध्यक्षा अजीत कौर ने वाज़िब ही कहा कि " दक्षिण एशिया के लोग आपस में बहुत ही मज़बूती से जुड़े हुए हैं , हमारी परंपराएं, हमारे तीज-त्यौहार, लोक-ज्ञान की पद्धति और लोक-गीतों इत्यादि में काफी कुछ साझा है |" सच है कि सीमाएं, सरहदें और सरकारें हमें एक-दूसरे से अलग-थलग नहीं कर सकतीं | हम लेखकों और कवियों को अपनी साझी विरासत की पहचान हमेंशा करते रहना चाहिए|
याद रखें, रविवार (7 अक्टूबर, 2018 ) को चौदहवें सत्र (12.10 बजे से ) की अध्यक्षता मैं करूँगा जिसमें मेरे सहित नौ कवि अपनी कविताओं का पाठ करेंगे - तीन कवि बांग्लादेश से और ६ छह कवि अपने देश की विभिन्न भाषाओँ से | आने की कोशिश करिए | इस सत्र में मुझे यह लाभ होगा कि हिंदी भाषा शायद सभी शिरकत करने वाले कवियों द्वारा समझी जाएगी | फिर भी जैसा कि अजित कौर जी का सुझाव था कि सभी लोग पढ़ी जाने वाली रचनाओं का अंग्रेजी अनुवाद ज़रूर ले आएं तो इस शर्त की वज़ह से मुझे उन कविताओं का चुनाव पहले ही कर लेना पड़ा है जिनका कल मैं पाठ करूंगा | इस काम को मेरे कवि मित्र संजीव कौशल ने आसान कर दिया| संजीव कौशल एक बेहद ज़हीन व्यक्ति हैं और मित्रता को अहमियत देते हैं | वे दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में अंग्रेजी भाषा और साहित्य पढ़ाते हैं और कई हिंदी साहित्यकारों की रचनाओं का अनुवाद अंग्रेजी में किया है | मैंने उनसे अनुरोध किया कि वे मेरी कविताओं का अनुवाद इस अवसर के लिए कर दें | उन्होंने मेरे आग्रह पर खुद ही मेरे पहले कविता-संग्रह " किसी उम्मीद की तरह " में से दो कविताएं चुन कर उनका अंग्रेजी में अनुवाद कर दिया है | मेरी इन कविताओं को मेरे संग्रह में पढ़ सकते हैं | यह संग्रह पंचकुला के आधार प्रकाशन ने छापा है | मैं यहाँ संजीव कौशल के द्वारा अंग्रेजी में अनूदित कविताएं दे रहा हूँ:
Familiar Sounds ( परिचित आवाज़ें )
Sounds that are familiar frighten
Lightning surrounded by clouds frighten
Closing of a door on second floor
Shakes my apartment on the first
Sound of the ball of a playing child
Almost frightens the lower floor
Sound of running footsteps
Incites fear every night
Of door being knocked at
Sound from second to the first floor
Seems coming from a distance
There is a mother growing old somewhere in the distance
An unemployed brother who reaches home late
Sometimes doesn't return at all
Slips into bed when returns
Avoids dreaming and babbling in sleep
There is a sound of these as well.
.
Bonsai (बोंसाई )
We have learnt many arts
In modern times
Bonsai is one of them
The Earth is placed in a flower pot
Trees whose roots run deep
Gather these roots within pots
The size of a banyan tree
Is shrinking like humans
This art is not applicable
On man
Man has no roots
His size shrinks easily
Man shows no signs of protest against shrinking
This art has developed even further
Man can reduce
Anybody's size
Gathered roots and branches
Spread within a banyan tree
It appears huge even in a pot
Man is fascinated
But bonsai laughs
इधर हमने अनेक जगहों पर कविता पाठ किया है | 17 सितम्बर , 2018 - देशबंधु महाविद्यालय में लिखावट के कैंपस में कविता ; 26 सितम्बर , 2018 -आत्मा राम सनधान धर्म महाविद्यालय में लिखावट के कैंपस में कविता ; 29 सितम्बर , 2018 - डॉयलाग में कविता-पाठ ; 5 अक्टूबर , 2018 - राजधानी महाविद्यालय में लिखावट के कैंपस में कविता ; 7 अक्टूबर , 2018 को साउथ एशियाई लिटरेचर फेस्टिवल में कविता-पाठ होगा
  

शनिवार, 13 जुलाई 2013

इतनी सारी हत्याएं

मिथिलेश श्रीवास्तव

पाब्लो नेरुदा की हत्या हुई थी । उनके मरने के चार दसक अर्थात चालीस बरसों के बाद जांच शुरू हो चुकी है ।। तब कहा गया था कि उनकी मृत्यु कैंसर से हुई थी । चिली के तब के तानाशाह अगस्तो पिनोचेट के आदेश पर यह हत्या हुई थी, ऐसा संदेह है । चिली जहाँ के नेरुदा थे, के बारे में कहा जता है कि वहाँ के लोग अपने आदर्श पुरुषों का आदर नहीं करते और उनकी टांग खिचाई करते हैं । भारत के लोगों खास कर के हिंदी वालों का स्वाभाव चिलीवासियों से हु-ब -हु मिलता  है ।  वे भी अपने आदर्श पुरुषों मसलन लेखकों, कविओं, कलाकारों के साथ चिलीवासिओं की तरह ही पेश आते हैं । एक अच्छा लिखता है तो दूसरा जल उठता है । एक को पुरस्कार मिलता है तो दूसरा सीने पर हाथ रखकर आल इज वेल कहने लगता है । पाब्लो नेरुदा की हत्या की जांच तो हो रही है , चालीस बरसों बाद ही सही । यहाँ रोज़ हत्याएं होती हैं , हत्या की कोशिश होती है और मज़ाल की कोई चू तक करे । 

मिसाल के तौर पर अज्ञेय  की हत्या करने की कोशिश बरसों से की जा रही है । उनके विपुल साहित्य को एक सिरे से खारिज़ करने की कवायद की तुलना आतंकवादी हमले से की जा सकती है । लेकिन अज्ञेय के लेखन की शक्ति है कि हमलों के बीच से वे फिर खड़े हो उठते हैं, बैसाखी के बगैर । हत्या की इस कोशिश के विरुद्ध कुछ कारगर आवाजें  हमेंसा उठती हैं लेकिन इसकी कोई जांच नहीं होती । रघुवीर सहाय की हत्या की कोशिश और पुरजोर ढंग से होती है । पहले पूछा जता है रघुवीर सहाय मार्क्सवादी हैं । हत्या की कोशिश के पहले रघुवीर सहाय को पढो तो सही । रघुवीर सहाय कहा करते थे कि वे आवाक हैं कि रघुवीर सहाय काम तो मार्क्सवादियों वाले करते हैं, लेकिन अपने आप को मार्क्सवादी नहीं कहते । अब रघुवीर सहाय से बढ़ कर जन कवि कौन हो सकता है जो मर तमाम लोगों को आगाह करते रहे कि हत्या होगी । जिस दिन दिनमान के संपादन से उन्हें विमुक्त कर दिया गया था उस दिन हमने कहाँ पूछा था कि एक नया मनुष्य बनाने के अभियान पर निकले एक कवि को  दिनमान से क्यों विमुक्त कर दिया गया । यह वही समय था जनता पार्टी की सरकार बिखर गयी थी, जय प्रकाश नारायण के संचालन में चले आन्दोलन अपने पराभव पर था और इंदिरा गाँधी की वापसी हो चुकी थी । समाज ने मान लिया कि वैचारिक विमर्श का समय ख़त्म हो गया और दिनमान को अस्त हो जाने दिया । दिनमान के पतन, दिनमान से रघुवीर सहाय का निष्कासन भी हमारे लिए आन्दोलन की वजह होना चाहिय था जो कि नहीं हुआ । क्या हमारी आखों के सामने हत्या होने के सदृश्य नहीं है यह ? अज्ञेय भी खूब पढ़े जा रहे हैं और रघुवीर सहाय भी । रघुवीर रचनावली अब उपलब्ध नहीं है, ऐसा बताते है। निर्मल वर्मा की भी हत्या की कोशिश हुई है जब उन्हें संघी कहा गया । 
रविन्द्र नाथ ठाकुर की हत्या की नई  कोशिश शुरू हो चुकी है । शुरुआत कन्नड़ लेखक गिरीश कर्नाड ने यह कह के किया कि ठाकुर के नाटक दोयम दरजे के हैं । अब  विष्णु खरे ने कहा है कि रविन्द्र नाथ ठाकुर को पढ़ता कोई नहीं है और उनका लेखन अंग्रेजी अनुवाद में दोयम दर्जे का लगता है । यह तो हद हो गई । विष्णु खरे से पूछा जाना चाहिए कि आखिरकार कौन से लेखक सच्चे मायने में पढ़े जाते हैं या पढ़े जा रहे हैं । किसी किताब की पांच सौ प्रतियां सरकारी खरीद के जरिय बेंच कर प्रकाशक हो रहे है मालामाल और लेखक वैसे के वैसे । विष्णु खरे, अशोक वाजपेयी, लीलाधर   जगूड़ी के मन में कहीं न कहीं यह कशक होगी ही  कि उनके लिए भी सुपारी दी गयी है तभी तो उनके साहित्यिक अवदान को तवव्जो जो मिलनी चाहिय मिल नहीं रही है। उदय प्रकाश तो घायल मन पड़े ही है। शिल्पायन सानिध्य में शामिल कविओं को तो भुन डालने की ही कोशिश की गयी थी । 

वार दोनों तरफ से हो रहे हैं । शीतयुद्ध के बाद वार का रूप आक्रामक हो गया है । सहनशीलता, सहिष्णुता, विराटता, उदारता तिरोहित हो रहे हैं । ऐसा क्यों हो रहा है शायद इसलिय कि दुनिया एकध्रुवीय हो गयी  है और साहित्य इस एकध्रुवीयता  के संकट को तो देख रहा है लेकिन इसकी ऐतिहासिक अनिवार्यता को स्वीकार करने से बच रहा है।    एकध्रुवीयता ने हमें स्वदेशी की परिभाषा को जानने समझने का एक अच्छा मौक़ा दिया है जिसको हम अपनी निरंतरता से जोड़  कर देख सकते हैं । रविन्द्र नाथ टैगोर ने इंसानियत की इसी निरंतरता के सौंदर्य को देखा और संगीतमय कविता में अभिव्यक्त किया जिसे सारे संसार में माना गया । वे ठाकुर थे, राजघराने से थे, रसूखदार लोगों का अंग्रेजी हुकुमत के साथ दोस्ती भी निभती थी  । वे इतने संपन्न थे कि वे अपनी रचना रसूखदारों के बीच ले कर जा सकते थे । 

मंगलवार, 5 फ़रवरी 2013

कुछ जज्बात मेरे भी-3

1.
मैं उससे बातें करती हूँ जब वो मेरे पास होती है
मेरे उद्वेलित होने पर पास आकर धीरे से
थाम लेती है मुझे
नहीं किरोलती मेरे दुःख को
नहीं करती खिलवाड़ मेरी भावनाओं से
मेरे दुःख पर हाथ फेरती है
दुखती रग पर नहीं
उस सागर से निकलती है
जिसमे मैं डूबना नहीं चाहती
मुझे हर डर से बचाती है
नहीं चाहिए मुझे वो भीड़
जो मुझे अकेला कर देता है
मैं खुश हूँ
अपनी तन्हाई से साया जो है वो मेरा
नहीं चाहिए वो भीड़
जहाँ मैं हो जाती हूँ अकेली
हाँ मेरी तन्हाई ही अब मेरा साया है
और मैं उससे ही बातें करती हूँ हमेशा

2.
जहाँ विश्वास हो वहां चमत्कार होता है
जहाँ चमत्कार होने लगे वहां से विश्वास पलायित होने लगता है
चमत्कार आँखों से दीखता है विश्वास दिल से
हम कहते हैं दिल की सुनो

3.
अनजाने में ही मैंने उससे पूछा
तुम्हे कहाँ जाना है भाई
उसने कहा , जहाँ की कोई खबर नहीं
मैंने फिर पूछा , तुम जानते हो किसी को वहां
उसने कहा , हाँ , जानता हूँ न
उन काले पत्थरों को जानता हूँ
उनमें सुलगती आग को जानता हूँ
उस आग में झुलसे बचपन को जानता हूँ
उनसे जले युवाओं के सब्र को जानता हूँ
जानता हूँ न ,क्यों नहीं जानता
उनकी उम्मीदों को जानता हूँ
उनके प्रतिरोध को जानता हूँ
क्या आप मुझे जानते हो
उसने मुझसे पूछा
और मै निरुत्तर हो गई           - अनीता  

 

सोमवार, 4 फ़रवरी 2013

कुछ जज्बात मेरे भी-2

1.
प्रासंगिक तो कुछ भी न था
फिर भी एक प्रसंग सा बन गया
नाउम्मीद तो कुछ भी न था
पर कहीं एक उम्मीद सी जगी
अन्याय के समंदर में
न्याय की एक शिला जरुर थी
वह शिला अहिल्या नहीं थी
जो राम के पावन स्पर्श के इंतजार में
जमी रही समंदर लहरों में भी
हाँ शायद वो डूबने से बचने का जरिया थी
आज वह शिला कितनी अहिल्याओं को देगा सहारा
और क्या बचा पायेगा लहरों से ?
क्यों ?
जी ,क्योंकि शिला ,अहिल्या नहीं ,
पर अहिल्या शिला जरुर बना दी जाती हैं
2.
उठो पार्थ गांडीव संभालो
ऐसा ही कहा था कृष्ण तुमने अर्जुन से महाभारत में
कहाँ हो कृष्ण ?
आज महाभारत है
ध्रितराष्ट्र भी हैं जो संजय की आँखों से देखते है
हाँ कोरवों की सेना पूरी है संख्या में
पांडव भी अपनी गिनती के हैं जो धर्मराज से वचनबद्ध हैं
अश्वथामा, द्रोण गुरु ,मजबूर है
कृष्ण नहीं हैं आज
पर भीष्म पितामह आज भी हैं पर
प्रतिज्ञाबद्ध ।
3.
रिश्तों की कसमसाहट को मैंने भी महसूस किया है
कभी वो रिश्ता हमें अपने साये में महफूज़ रखता है
कभी हमें निर्वस्त्र कर देता है
हाँ रिश्ते आजकल वस्त्र की तरह होते जा रहे हैं
पर मैले होने पर बेदाग नहीं हो सकते वस्त्र की तरह
जब हमें उसकी कसमसाहट से घुटन होने लगती है
हम उसका दायरा बढ़ाने के बजाय बदल देते हैं वस्त्र की तरह
और डाल लेते हैं अपने ऊपर मज़बूरी का एक मोटा जामा
खुद को बचाए रखने के लिए
क्योंकि रिश्तों की गर्माहट कम होने लगी है
4.
आकृतियाँ बनती हैं बिगड़ने के लिए
आकृति को बिगड़ने से बचाना है
अपनी मनचाही आकृति हम खुद बनाते हैं
और उसमे अनचाहा रंग भर देते हैं
एक आकृति मैंने भी बनाई थी
उसमे सारे रंग भर दिए थे
तभी वह सफ़ेद हो गया
कहते हैं सारे रंगों का मेल
एक ऐसा रंग देता है
जो बेरंग होता है
अब आकृतियाँ तो बनती हैं
पर उसमे रंग भरने से डरती हूँ
5.
निस्तब्ध थी वो रात
बेचारगी से भरी थी दुनिया
मन का खुद से हो रहा था प्रतिरोध
और भस्म हो रहा था विश्वास
कहीं किसी ओर नहीं था कोई प्रतिकार
सन्नाटे चीर कर आई एक चीत्कार
और हो गयी फिर कोई और एक ममी में तब्दील     -अनीता 

कुछ जज्बात मेरे भी-1

1
जज्बात दिल में न हों
तब उसकी यादें ,न तो मीठी होती है न कड़वी
फिर उसकी दिल में क्या जगह
पर उसे दिल से निकाल कर
दिमाग के किसी कोने में बंद कर देना चाहिए
ताकि दिल को कोई तकलीफ न हो ,
पर दिमाग में वह एक सोच की तरह हो
वह सोच जो हमें कुछ ताकीद करें
2
लगता है एक पल कोई रिश्ता बनाने में
मुश्किलें आती हैं मगर दूर तलक उसे ले जाने में
वादा करते तो हैं ता:उम्र उसे निभाने का
टूट जाते हैं मगर रिश्ते जाने अनजाने में
आता क्यूँ है कोई अपना बन कर दिल के करीब
जब होती है मुश्किल एक गलती भी भुलाने में
खैर अच्छा किया तोड़ दिया भ्रम मेरा
सोचती थी की हूँ अच्छी रिश्ते निभाने में
टूटे रिश्ते तो चुभते तो होंगे उन्हें
मेरा दिल अकेला ही तो ऐसा नहीं ज़माने में

किसी रोज एक क्षण गुजर जाता
शायद आता
पर आता तो सही
छोड़ जाता कुछ मधुर यादें
पर ,आता तो सही

दो जानने वाले अजनबी
अनजान रहे
पाता ही न चला
साथ रहकर भी अकेले रहे
सानिध्य की तलाश में
इक दूजे को दूंदते हुए
खो गए एक दूजे में नहीं

वक्त के कुछ पलों की गुजारिश है
मुश्किलों के साथ चलने की हमें ख्वाहिश है
जिंदगी हम कुछ इस तरह से जीते हैं कि
हर पल हौसलों की अजमाइश
चलकर गिरना ,गिरकर संभल जाना है
क्या फिर से गिरने की गुंजाइश है
हाँ जीवन की यह भी एक नुमाइश है       -अनीता 

गुरुवार, 10 जनवरी 2013

नारे आवाजें और मोमबत्तियां-मिथिलेश श्रीवास्तव

29 दिसम्बर ,2012 शनिवार था और वह दिन अकादमी आफ फ़ाईन आर्ट्स एंड लिटीरेचर के बहुप्रशंसित मासिक साहित्यिक कार्यक्रम डायलाग का था।रघुवीर सहाय की स्मृति को समर्पित इस स कार्यक्रम में आज के समय में उनकी प्रासंगिकता पर परिचर्चा होनी थी और उनकी कविताओं का वाचन होना था। तबतक देश दामिनी के साथ हुए दर्दनाक हादसे के शोक में डूब चुका था। हम सब उस हादसे को ऐसे महसूस कर रहे थे जैसे दामिनी हमारी बेटी है और वह हादसा हमारे घर में ही घटित हुआ है । न भूख लग रही थी, न नींद आ रही थी, न दिल में नए साल के आगमन का हुलास था। टेलीविजन खोलकर दामिनी के ठीक होने की खबरें जानने के लिए बैठे रहते। उस दिन सुबह से सैकड़ों फोन आ चुके कि क्या डायलाग में रघुवीर सहाय की स्मृति में आयोजित कार्यक्रम होगा। त्रिनेत्र जोशी का पहला फोन आया। लगभग सिसकते हुए त्रिनेत्र जोशी ने पूछा कि क्या यह कार्यक्रम होना चाहिए। मंगलेश डबराल का फ़ोन आया, क्या आज कार्यक्रम होगा। संजय कुंदन, प्रियदर्शन, उपेन्द्र कुमार, लीलाधर मंडलोई और कई अनेक साहित्यकार मित्रों ने फोने करके यही प्रश्न पूछा। उनके सवाल करने के पीछे भावना यही थी कि जब देश शोक में डूबा हो और दामिनी के ठीक होने के लिए प्रार्थना कर रहा हो ऐसे में इस कार्यक्रम को स्थगित कर देना चाहिय । सब लोग शोक संतप्त से थे। मैंने सबसे कहा कि कार्यक्रम होगा। आप सब आयें। रघुवीर सहाय और उनकी कविता व्यवस्था विरोध का ही दूसरा नाम है। हम उनकी कविताएँ पढ़कर और उनको यादकर अपना आज विरोध प्रकट करेंगे। क्रूर और नृशंस होते जा रहे समाज, सरकार, व्यवस्था, पुलिस, राजनीति और उस आदमी के जो हम बना रहे हैं के प्रति हम अपना विरोध और रोष प्रकट करें। मेरे ऐसा कहने पर कार्यक्रम होने देने के लिए सब तैयार हुए और आखिर में वह कार्यक्रम एक शोक सभा और विरोध प्रदर्शन में बदल गया। कई पीढ़ियों के लगभग सत्तर कवि लेखक थे जिन्होंने अपना रोष प्रकट किया । रघुवीर सहाय की एक कविता पढ़ी जाती और विरोध का प्रदर्शन होता । कविता पढ़ने के पहले हहर कवि-वाचक अपने वक्तव्य में उस घटना की निंदा करता और पुलिस और व्यवस्था के विरोध में बोलता। लेकिन यह व्यवस्था विरोध यहीं नहीं हुआ बल्कि देश का हर घर व्यवस्था विरोध की जगह में बदल चुका था। हर परिवार अपने बैठक में टेलीविजन के चौबीस घंटे वाला समाचार चैनल खोलकर बैठा रहा और पल पल की अपनी प्रतिक्रिया से सरकार और व्यवस्था का विरोध कर रहा था। उनकी दुआओं में दामिनी थी उनकी शुभकामनाएं दामिनी के लिए थीं। वे चाहते थे कि सरकार दामिनी के इलाज और उसे बचाने में कोई कोताही नहीं बरते। डाक्टर कोई ढिलाई नहीं बरतें। साधनों की कमी न हो। दामिनी तो बचायी नहीं जा सकी लेकिन अब लोग आज भी इस बात के लिए प्रार्थनारत हैं कि उसे न्याय मिले, अपराधियों को जल्द से जल्द कड़ी से कड़ी सजा मिले। व्यवस्था, पुलिस, सरकार चेते और अपने दायित्व का सही निर्वाह करे। हम जो आदमी बना रहे हैं उसे और अच्छे से बनायें। 

दरअसल कार्यक्रम का होना या न होना यहाँ महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि यह जान लेना शुकून देनेवाला था कि समाज का हर तबका इस दुख में अपने आपको शामिल पा रहा था और परिवर्तन की आकांक्षा से भर गया था। लेखक भी इसी समाज में रहता है और एक साधारण सामाजिक प्राणी की तरह उस दुःख में शामिल था और हर उत्सव का प्रतिकार और वहिष्कार कर रहा था और कर देना चाहता था। यह पहली बार हुआ कि इस घटे को सारे देश ने अपने घर में घटा हुआ महसूस किया। कई परिवारों में तो टेलीविजन इसलिय देखा जा रहा था ताकि पल पल की खबर मिलती रहे। 

राजपथ पर युवाओं जिनमें संतानवे प्रतिशत छात्र थे, को देखकर 1975 का बिहार का छात्र आन्दोलन याद आ रहा था । वह एक आन्दोलन था जिसे छात्रों ने अंजाम दिया था। आज के आन्दोलन में भी हमारे बच्चे हिस्सा ले रहे थे। हमारे युवाओं के प्रति जो यह धारणा बनने लगी थी कि वे बाजार परस्त हो गए हैं, मौजमस्ती में ही रहने वाले हो गए हैं, परिवार, समाज और राजनीति से विमुख होते जा रहे हैं अचानक इस आदोलन की वजह से टूट गई। हमारे बच्चों में विरोध करने की आकांक्षा भी है, ताकत भी है। दुःख को महसूस करने की संवेदना भी है। पानी की बौछारें वे सह सकते हैं, लाठियों की मार से उनकी हड्डियाँ टूटती नहीं। सरकार और पुलिस उनके हौसले तोड़ नहीं सकते। वे अपनी आखों से अपने देश, समाज, परिवार और लोगों को देख रहे हैं। हमारे बच्चों ने हमें यतीम हो जाने के लिए छोड़ नहीं दिया है। यह आन्दोलन एक बच्ची के साथ हुए हादसे के लिए संघर्ष कर रहा था । अगर यह आन्दोलन जोर नहीं पकड़ता तो अस्पताल से लेकर पुलिस प्रसाशन तक उस बच्चे के साथ लापरवाही भरे बर्ताव करता। इतना ही नहीं यह आदोलन सारे प्रशासनों की जड़ और संवेदनाविहीन प्रवृतियों के विरुद्ध भी एक जायज और सार्थक आवाज थी । हम सब इस आन्दोलन में शरीक हैं। हमारे बच्चों के नारे, उनकी मोमबत्तियों से निकली हुई रोशनियाँ, उनके विरोध की आवाजें ही हमें बचाए रखेगीं।